प्रदर्शन के हिंसक होने के साथ पुलिस की बदनामी क्यों

भारत लोकतांत्रिक देश है जहां पर प्रदर्शन/विरोध करना लोकतंत्र का हिस्सा है ।लेकिन प्रदर्शन के हिंसक होने के साथ पुलिस की बदनामी क्यों होती है |

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प्रदर्शन के हिंसक होने के साथ पुलिस की बदनामी क्यों

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ /विचार :- भारत लोकतांत्रिक देश है जहां पर प्रदर्शन/विरोध करना लोकतंत्र का हिस्सा है । इसमें कोई एतराज नहीं , प्रदर्शन के भी कई रूप होते हैं लेकिन पिछले कुछ समय से देखने को मिल रहा है कि प्रदर्शन के नाम पर हिंसक झपट हो रही है यहां तक कि कुछेक प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से भी हुए लेकिन इस संबंध में अच्छे से जानकारी नहीं और ना ही हमने जानने में दिलचस्पी ली ।

यहां तक कि हमारी मीडिया द्वारा भी यह या तो लुप्त हो जाती है या फिर लुप्त कर दी जाती है । जब हमें छोटी बड़ी बात पर हिंसक प्रदर्शन से हमें सामना करना पड़ता है तो हम सबके दिमाग में एक ही सवाल आता है ।कि आखिर हिंसक प्रदर्शन क्यों ? अगर हम शांत वातावरण में सोचें तो इसके बहुतायत कारण हो सकते हैं। प्रदर्शनकारी जब समूह में होते हैं तो ज्यादा उन्मादी होकर कुछ अलग हरकतें करते हैं ।उनके साथ राजनीतिक हाथ होने के कारण दिमाग में यह चलते रहता है कि मैं कानून हाथ में लेने के लिए स्वतंत्र हूं ।या फिर अगर प्रदर्शन हिंसक नहीं हुआ तो उचित स्थान तक पहुंचेंगा ही नहीं। क्योंकि हिंसा होने के साथ ही जनता , पुलिस और मीडिया की भूमिका बढ़ जाती है।

आखिर पुलिस पर लोग क्यों बरसते हैं? कैसे पुलिस हर बार बदनाम हो जाती है ?

आज तकनीकी की दुनिया में चारों तरफ वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल होने लगते हैं। नेटवर्किंग मीडिया भी बाकी खबर को छोड़ उस क्लिप में और मसाला लगाकर प्रस्तुती करती हैं। ऐसा नहीं है कि हिंसा होने के बाद उनका पक्ष बहुत मजबूत होता है और ना ही मारे गए लोगों के परिवार की कोई सुध जानने पहुंचता है न मरने वाले की कारण जानने की कोशिश होती है ।यही नहीं प्रदर्शन होने से पहले ही राजनीतिक दबाव में या स्वेच्छा से पुलिस द्वारा विरोध रोकने की कोशिश / धारा 144 लगाना भी उनके उग्र होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फिर सवाल उठता है कि पुलिस तो अपना कार्य ही करती है इसमें पुलिस की क्या गलती हो सकती है ?आखिर पुलिस पर लोग क्यों बरसते हैं? कैसे पुलिस हर बार बदनाम हो जाती है ?क्यों लोगों का ध्यान पुलिस पर ही केंद्रित हो जाता है? [metaslider id=2268]

वो भी तब जब लोगों को ज्ञात है कि यह वहीं पुलिस है जो बाढ़ या किसी भी आपदा में रक्षक बन कर उनके सामने आती है ।उनके सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर रखी रहती है। और हैरानी तो तब होती है जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक रिपोर्ट के अनुसार 663 व्यक्ति पर एक पुलिसकर्मी, 100पुलिसकर्मी पर एक पुलिसवाहन ,पूरे देश में 22% पद रिक्त हैं, 25 फिसदी पुलिसवालों को सप्ताह में 1 दिन छुट्टी नसीब नहीं होती , औसतन एक पुलिस वाला रोज 14 घंटे कार्य करता है। फिर कहां चूक होती है? इसे समझने की कोशिश करते हैं जब लोग प्रदर्शन कर रहे होते तो किसी न किसी रूप में राजनीतिक पार्टी ,उनके नेता या सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ होता है ।

पुलिस अपने फर्ज के रूप में अपना कार्य करती हैतो प्रदर्शनकारी पुलिस पर ही टूट पड़ती है

जो कि सीधे उनके संपर्क में नहीं आते और वह अपना विरोध अथवा गुस्से को जाहिर करने के लिए प्रदर्शन को उग्र

 दिवाकर पाण्डेय
दिवाकर पाण्डेय

रूप देने की कोशिश में सरकारी संपत्ति जैसे वाहन फुकना , रेलवे पटरी उखाड़ना, ट्रेनों को क्षतिग्रस्त करना ,चारों तरफ तोड़ फोड़ करना आदि। कई बार इनके चपेट में आम नागरिक भी आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में सत्तारूढ़ पार्टी पुलिस को प्रदर्शन रोकने का आदेश करती है और जब पुलिस अपने फर्ज के रूप में अपना कार्य करती है ।तो प्रदर्शनकारी पुलिस को अपने विरोध में उत्पन्न अवरोध और पुलिस को ही सरकार का प्रतिनिधित्व करते देख उन पर टूट पड़ते हैं।

ऐसे में कभी पुलिस तो कभी आम जनता को भारी नुकसान के साथ जाने भी गंवानी पड़ जाती है ।और इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता कि राजनीतिक दबाव में कई बार कुछ गलतियां पुलिस से भी हो जाती है ।लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुलिस वाला निहत्था मुंह के बल जमीन पर गिरा हो और उस पर पत्थर मारे जाए। उस समय उनकी आत्मा से भी यही आवाज आती होगी :

“जब चमन को जरूरत थी खून दिया हमने,जब बहार आई तो चमन ने पूछा तेरी जरूरत क्या है”

हम 21 वीं सदी के भारत की ऐसी कल्पना नहीं कर सकते। हमें खुद को समझना ही होगा ।कुछ महत्वकांक्षी पेशेवर नेताओं के चक्कर में खुद के महत्व को खत्म नहीं कर सकते ।हम, आप और सब शिक्षित हो रहे हैं फिर अशिक्षित जैसे व्यवहार क्यों? वर्तमान स्थिति पर केंद्रित मेरा लेख बस एक छोटा सा प्रयास है।।

-दिवाकर पाण्डेय

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