अग्निहोत्र करते-करते महापुरुषों ने जो लिखा वही प्रमाण है

हमारे देश में सबसे पहले महर्षि बाल्मीकि के श्री मुख से जो कथा की धारा बही। उसको विदेशी लोग केवल दंतकथा समझने लगे। अग्निहोत्र करते-करते महापुरुषों ने जो लिखा है न वही प्रमाण है। सिगरेट पीते-पीते जिसने लिखा प्रमाण नहीं माना जा सकता।

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अग्निहोत्र करते-करते महापुरुषों ने जो लिखा है वही प्रमाण है- मोरारी बापू

बक्सर अप टू डेट/ए0एन0चंचल- महर्षि विश्वामित्र की तपस्थली और श्रीराम की शिक्षण स्थली सिद्धाश्रम की पावन धरा पर नौ दिवसीय श्रीराम कथा के तृतीय दिवस पर मानस अहिल्या को केंद्र में रखते हुए सात्विक तात्विक संवाद को आगे बढ़ाते हुए अंतर्राष्ट्रीय संत रामकथा वाचक मोरारी बापू ने कहा कि रामचरितमानस के सभी प्रसंगों को, पात्रों को, घटनाओं को कृपया केवल रूपक ना समझना। यह परिपूर्ण सत्य है।

क्यों?रूपक  समझकर उसकी तात्विक चर्चा स्वागत योग्य है। लेकिन केवल उसको रूपक ही समझ लेंगे और केवल उसका केवल तात्विक अर्थ लगाते रह जाएंगे।

हमारे देश में सबसे पहले महर्षि बाल्मीकि के श्री मुख से जो कथा की धारा बही। उसको विदेशी लोग केवल दंतकथा समझने लगे। अग्निहोत्र करते-करते महापुरुषों ने जो लिखा है न वही प्रमाण है। सिगरेट पीते-पीते जिसने लिखा प्रमाण नहीं माना जा सकता। कुछ इतिहास सिगरेट फूंकते-फूंकते लिखे गए हैं। जिसमें पाश्चात्य तथाकथित सभ्यता के बिके हुए विद्वानों का नाम है, जो चंद सिक्कों पर बिक गए थे।ads buxar

जिसके हाथ में कमंडल हो और कमंडल में गंगा हो और एक हाथ में हरि भजन की माला हो, उसके शब्द भारत प्रमाण हैं। जिसके हाथ में सूरा का प्याला हो और अपनी केबिन में बैठे-बैठे भारतीय सभ्यता को कलुषित करने के लिए जिन लोगों ने प्रयास किए हैं, उनको मेरे देश की जनता प्रमाण न समझे। यहां साधु की अंतः करण की प्रवृत्ति को प्रमाण माना है।

मानस की तुलना किसी से नहीं हो सकती।

समग्र विश्व की सभ्यता एक पलड़े में डालो और दूसरे में मानस को नहीं तुलसी की चौपाई डालो। ताकत नहीं पलड़े को वो कर सके। अहल्या मतलब जिस भूमि को आज तक जोता नहीं गया है अर्थात बंजर भूमि।

पहली बार व्यासपीठ ने व्यासपीठ के पास ब्रह्म भोजन कराया। परमात्मा ब्राह्मण के श्री मुख से खाता है, भोजन करता है। मामा के घर में ही यह हो सकता है और कहीं नहीं।

जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि यह दुख है दोष नहीं है। जन्म लेना दुख हो सकता है, दोष नहीं। जन्मोत्सव होता है, जन्मोत्सव होना चाहिए। संवेदनशील आदमी को पीड़ा होना स्वाभाविक है लेकिन दोष नहीं है। वीरों को सफलता निष्फलता का द्वंद नहीं होता है।

विनोवा जी के सर्वोदय को फिर से एक बार दुहराते हुआ उन्होंने कहा कि जैसे विश्व को सूर्योदय की आवश्यकता है वैसे ही सर्वोदय की भी।

अहल्या अंजनी और शतानंद की मां है। अंजनी- शतानंद बहन-भाई हैं, और अंजनी का बेटा हनुमान। प्रभु श्रीराम के चरण रज के स्पर्श होते ही केवल अहल्या ही प्रकट नहीं हुई बल्कि जिस पेड़ से फूल नहीं आते थे उसी समय फूल आ गए। जिस पेड़ से फल नहीं लगते थे उसी समय फल लग गए। जहां जहां पक्षियां सगर्भा थी वहां बच्चे चहचहाने लगे।

श्रीराम जन्मभूमि पर अपना विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि 60 साल से प्रवचन कर रहा हूं,मुझे भी दो बोल बोलने का अधिकार है। राम मंदिर ऐसा हो, जो जगत में वैसा मंदिर न हुआ हो, ना हो। जहां लौकिक ना हो सब अलौकिक हो।

इस अहल्या के प्रकरण में बिना विश्वामित्र जी को समझे हम अहल्या का पूरा जीवन दर्शन नहीं प्राप्त कर सकते।

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