तुलसीदास जयंती विशेष- है नमन पाद पद्मों में बारंबार बाबा तुलसी

बक्सर अप टू डेट न्यूज़:- आज श्रावण शुक्ल सप्तमी है। आज ही के दिन भक्ति साहित्य के अनंत आकाश में विद्यमान श्री राम चरित मानस एवं विनय पत्रिका जैसे दिव्य ग्रंथ के रचयिता, महर्षि वाल्मीकि के अवतार तुलसीदास जी का इस धरा धाम पर प्रादुर्भाव हुआ। जिनकी चमक से पूरा विश्व प्रकाशित है। जीवन के हर एक समस्या का समाधान तुलसी दास रचित श्री रामचरितमानस में विद्यमान है।

आइये इस महान विभूति के जयन्ती पर उनके जीवन के बारे में जानते हैं – गोस्वामी तुलसीदास जी का प्रादुर्भाव श्रावण मास शुक्ल पक्ष सप्तमी संवत 1568 में राजापुर ग्राम में हुआ। आपकी माता हुलसी एवं पिता आत्माराम हैं। जन्म के समय आप के मुख में बत्तीसों दाँत विद्यमान थे।

जन्म के साथ ही आप ने राम-राम बोलना शुरू कर दिया, जिससे आपको लोग रामबोला कहने लगे। जन्म के कुछ ही दिनों के बाद माता जी का देहावसान हो गया और आप का पालन पोषण हरिपुर ग्राम में चुनिया नामक दासी द्वारा किया गया ।

साढ़े 5 वर्ष की अवस्था में चुनिया ने भी देह त्याग दिया। आप गली-गली भटकते हुए अनाथों की तरह जीवन व्यतीत करने लगे। भगवान भोलेनाथ की प्रेरणा से श्री अनंतानंद जी के परम शिष्य श्री नरहरि दास को आपके बारे में जानकारी मिली। नरहरी दास जी ने इस अद्भुत बालक को खोज निकाला और आपका नाम तुलसीराम रखा।

तदुपरांत आपको लेकर अयोध्या चले आए। इसके बाद नरहरी बाबा ने वैष्णव के पांचों संस्कारों को करके राम मंत्र की दीक्षा दी और अयोध्या में ही रह कर विद्या अध्ययन कराया ।

बाद में गुरु नरहरि दास की कृपा सेआप शेष सनातन जी के पास काशी आकर वेद वेदांग का अध्ययन किये। बाद में तुलसी दास जी का विवाह रत्नावली के साथ हुआ।एक बार रत्नावली मैके गई थी।अचानक आधी रात पत्नी की याद आई और आप रत्ना से मिलने के लिए चल दिए। भयंकर अंधेरी रात में उफनती यमुना नदी को तैर कर पार किए और विषधर सर्प को रस्सी समझकर छत से होते हुए सीधे रत्ना के शयन कक्ष के दरवाजे पर पहुंच गए।

इतनी रात को आप को अकेले देखकर रत्ना आश्चर्यचकित हो गई और कहा कि आप चुपचाप वापस चले जाएं। परन्तु आप उसे अपने साथ चलने के लिए आग्रह करने लगे। दोहे के माध्यम से आपको कहा कि, “अस्थि चर्म मय देह यह ता पर जितनी प्रीति। तिसु आधी जो राम प्रति अवशि मिटै भव भीति।।” अर्थात हाड़- मांस की देह से इतना प्रेम के बजाय आपने इतना प्रेम राम नाम से किया होता तो जीवन सुधर जाता।

इस पर तुलसीराम का अंतर्मन जाग उठा और वे राम नाम की खोज में निकल पड़े। वहां से काशी लौट आए और वहां की जनता को राम कथा सुनाने लगे।

एक दिन आपको एक प्रेत से मुलाकात हुई, जिसने आप को हनुमान जी से मिलने का रास्ता बताया। आप हनुमान जी से मिलकर प्रभु श्री राम के दर्शन की इच्छा जाहिर किये। हनुमान जी ने बताया कि प्रभु श्री राम के दर्शन आपको चित्रकूट में होंगे। आप चित्रकूट चले आए।

वहां आप परिक्रमा करते हुए जा रहे थे कि रास्ते में हरे रंग की पोशाक पहने हुए दो सुंदर राजकुमार दिखाई दिए। जो घोड़े पर सवार होकर धनुष-बाण लिए हुए जा रहे थे। आप उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए, परंतु पहचान नहीं सके चित्रकूट मंदाकिनी के तीर राम घाट पर तुलसीदास जी चंदन घिस रहे थे।

प्रभु श्री राम पुनः बालक रूप में प्रकट हुए। तुलसीदास जी से बोले,”बाबा थोड़ा-सा चंदन हमें भी दोगे?” हनुमानजी ने सोचा कहीं इस बार भी धोखा ना खा जाए। इसलिए उन्होंने शुक रूप धारण करके वृक्ष डाली पर से ही संकेत दिया। “चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसे तिलक देत रघुवीर।।” भगवान श्री राम की अद्भुत छवि को निहार कर आप सुध बुध खो बैठे।

अंततोगत्वा प्रभु ने स्वयं ही आपके मस्तक पर चंदन लगाया और अंतर्ध्यान हो गए आपने संवत 1631 में रामनवमी के दिन श्री रामचरितमानस की रचना प्रारंभ की। इसकी रचना में 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन लगे।

संवत 1633 के विवाह पंचमी के दिन सातों कांड पूर्ण हुए। इनके अलावा आपने विनय पत्रिका, दोहावली,कवितावली,हनुमान चालीसा, जानकी मंगल, पार्वती मंगल इत्यादि ग्रंथों की रचना की।

परम पूज्य संत नारायण दास भक्तमाली “मामा जी” के शब्दों में —
है नमन पाद पद्मों में बारंबार बाबा तुलसी। कलि कुटिल जीव निस्तार हेतु अवतार बाबा तुलसी।।
मैया हुलसी के लाल दास तुलसी, तुम्हारो ऋणियां सकल संसार।।
—— ए0एन0चंचल

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