हिंदी दिवस पर विशेष : राजभाषा हिंदी की उपेक्षा तो अपेक्षा क्यों??

बक्सर अप टू डेट न्यूज़|वीरेंद्र पांडेय:- चलचित्र-“बस इतना सा ख्वाब है” अभिषेक बच्चन द्वारा अभिनीत हिंदी के संवेदनशील पक्ष भाषा से संबंधित है। चलचित्र में नायक से जो पत्रकार है, उसे एक विशेष कहानी लाने के लिए कहां जाता है। विशेष कहानी के लिए गांव के जिस परिवार में पहुंचता है,उस परिवार का एक युवक शहर में अध्ययन करने हेतु गया था।

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महाविद्यालय में अंग्रेजी बोलना उसकी मजबूरी हो जाती है। लेकिन अंग्रेजी के अल्प ज्ञान के कारण उसे पूरी कक्षा में हँसी का पात्र बना दिया जाता है। अंततः अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होने के कारण वह आत्महत्या कर लेता है। आज भी भाषा के संदर्भ में विकसित देशों ने भारत में भ्रम फैलाने में सफल रहे कि जो अंग्रेजी नहीं जानेगा,वह ज्ञान के अक्षय कोष से वंचित हो जाएगा। परिणामस्वरूप भ्रम के कुहासे में भारतीय जनमानस पूरी तरह फंस चुका हैं।

आज भी संघ के सभी राजकाज की भाषा अंग्रेजी

व्यवहारिक रूप से आज भी संघ के सभी राजकाज की भाषा अंग्रेजी है। सभी शासकीय आदेश, संवैधानिक संशोधन, कानून के संशोधन इत्यादि अंग्रेजी में तैयार किए जाते है। सभी मंत्रालयों के कार्य अंग्रेजी में होते हैं। हिंदी में केवल अनुवाद किया जाता है। संविधान ने महामहिम राष्ट्रपति को हिंदी के प्रचार-प्रसार का दायित्व सौंपा है। लेकिन डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, ज्ञानी जैल सिंह और डाक्टर शंकर दयाल शर्मा के कार्यकाल में ही यह दायित्व निर्वहन किया गया।

“संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी

14 सितम्बर 1949 को भारत की संविधान सभा ने हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। किसी भी देश के संविधान द्वारा स्वीकृत भाषा”राजभाषा”होती है।इस भाषा से ही पूरे देश का प्रशासनिक कार्य किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार-“संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रुप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा”।

अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश

इसके साथ ही उल्लेखनीय है कि वर्ष 1963के राजभाषा अधिनियम (यथा संशोधित 1967) के अनुसार 26 जनवरी 1965 से अंग्रेजी को भी सह राजभाषा के रूप में तब तक जारी रखने का प्रावधान किया है,जब तक अंग्रेजी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी राज्यों के विधान मंडलों द्वारा जिन्होंने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संकल्प पारित नहीं कर दिए जाते। इसके साथ ही एसी समाप्ति के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा संकल्प पारित किया जाना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश दिए गए है।

राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग के लिए वर्ष 1976में कुछ नियम बनाए गए, जिनके अनुसार भारत सरकार के गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग कार्य कर रहा है। प्रश्न यह उठता है कि विश्व भाषा बनने में सक्षम हिंदी भारत में ही राजभाषा के रूप में क्यों नहीं स्थापित हो सकी? भारत के सम्पूर्ण राज्यों में से कुछ राज्य यथा बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली में हिंदी राजभाषा के रूप में स्वीकृत है।

इन्हें “क”श्रेणी का माना गया। कुछ राज्यों में राजभाषा के रूप में हिन्दी के अधिकाधिक प्रयोग को मान्यता दी गई है। इन्हें”ख”का माना गया।शेष बचे राज्य”ग”में रखा गया है,जो हिंदी को धीरे- धीरे स्वीकार करेंगे।यथा-आंध्र,केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, उड़ीसा, बंगाल,असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर। यही राज्यों की श्रेणी ने राजभाषा के रूप में रुकावट पैदा की।

द्वितीय राजभाषा के रूप में उर्दू को मान्यता

सम्पूर्ण भारत को हिंदी भाषी एवं गैर हिंदी भाषी में बांटने की कोशिश की गई। जिसमें वह सफल भी हुए। तत्कालीन केंद्र सरकार की अकुशलता एवं दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी ने राज्यों के विरोध का बहाना बनाकर अंग्रेजी भाषा पर ध्यान देने लगी। इसके साथ ही हिन्दी को हिन्दू से जोड़ा जाने लगा। तभी कुछ राज्यों ने तुष्टिकरण के कारण द्वितीय राजभाषा के रूप में उर्दू को मान्यता दी। यदि वर्तमान में “ख” एवं “ग” श्रेणी राज्यों का सहयोग मिले तो हिंदी राजभाषा के रूप में स्थापित हो सकती है।

इसके अतिरिक्त शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक पाठ्यक्रम को हिंदी में अध्ययन एवं अध्यापन कराया जाए। वैसे भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, भारतेंदु, प्रसाद,पंत, निराला, महादेवी वर्मा, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मुंशी प्रेमचंद, दिनकर, अज्ञेय सहित अन्य की हिंदी दिनों-दिन प्रगति कर ही रही है। हिंदी साहित्य में कबीर, जायसी, तुलसी जैसे संतों के योगदान को याद करते हुए कह सकते है-“कबीरा,संस्कृत कूप जल, भाषा बहता नीर” |। इति शुभम् ।|

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