डीजीपी का विशेष आलेख- किसी के व्यवहार से दुःखी होना भी अज्ञानता

ads buxarडीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का यह विशेष आलेख “किसी के व्यवहार से दुःखी होना भी अज्ञानता हीं है” केवल उनके लिए है जो आत्म कल्याण के लिए उत्सुक हैं.

डीजीपी का विशेष आलेख- किसी के व्यवहार से दुःखी होना भी अज्ञानता

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ :- डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का यह विशेष आलेख “किसी के व्यवहार से दुःखी होना भी अज्ञानता हीं है” केवल उनके लिए है जो आत्म कल्याण के लिए उत्सुक हैं.

व्यवहार विज्ञान :

आध्यात्मिक विश्लेषण : किसी के व्यवहार से दुखी होना भी अज्ञानता ही है. यह इस बात का पक्का प्रमाण है कि हम ज्ञान के कच्चे हैं. और अध्यात्म में अनाड़ी हैं और हमारी साधना की पूँजी कम है. या बिलकुल शून्य है. हमें जागरूक रहकर अपने आपको देखने और समझने की कोशिश करनी चाहिए. दुःख बाहर नहीं है और बाहर के कारण, कोई व्यक्ति,वस्तु या कोई परिस्तिथि हमें दुखी कर ही नहीं सकती.

यदि हमें अपने स्वरूप की हल्की भी समझ हो. हम सभी ईश्वर के पुत्र हैं, और उसी परम सत्ता के अंश हैं. हमें बनाने वाला एक है और उसी तक पहुँचना हमारा अंतिम लक्ष्य भी है. इस नाते हम सब मूलतः एक ही सत्ता के ही छोटे से अंश हैं और सब एक दूसरे से बिलकुल अभिन्न हैं. हम सब में वह परम सत्ता विद्यमान है .

हम सब एक ही हैं.

यहाँ हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई या किसी जति-पाति का भेद है ही नहीं. लेकिन चेतना के जिस स्तर पर यह अनुभूति होती है. हम चेतना के उस स्तर पर नहीं हैं, इसलिए भेद दृष्टि है और इसी भेद दृष्टि के कारण जाति मज़हब के झगड़े हैं. इसी भेद दृष्टि यानि अज्ञान के कारण, अहंकार के टकराव हैं. अपने को एक दूसरे से ऊँचा साबित करने की होड़ है. कलह है, ईर्ष्या है, द्वेष है और संघर्ष भी है. इस जीवन के संघर्ष में जब हमें कोई गाली देता है, हमारा अपमान करता है.

हमें जलील करता है तो हम मानसिक पीड़ा से छटपटाने लगते हैं. और फिर प्रतिशोध की आग में जलाने लगते हैं. फिर शुरू होता है मानसिक दुखों का अंतहीन सिलसिला. हम अपनी अज्ञानता पर ध्यान ना देकर उस व्यक्ति को दोष देने लगते हैं. और उसको ही अपने दुखों का कारण समझने लगते हैं. लेकिन आध्यात्मिक विज्ञान की दृष्टि से ये उचित नहीं है. वस्तुतः दुनियाँ में कोई बुरा नहीं. आइये इस विज्ञान को हम समझने की कोशिश करते हैं!

वस्तुतः

हर जीव (आदमी) प्रकृति के तीन गुणों से ( मुक्त होने तक) बंधा हुवा है. एक साथ ये तीनो गुण सब में रहते हैं और रहेंगे ही. लेकिन अलग अलग व्यक्ति में अलग अलग गुणों की प्रधानता होती है. और उसके अनुसार उसका विचार और आचरण होता है. ये तीन गुण हैं- तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण. जीव के सारे विचार स्वभाव और संस्कार इन तीन गुणो के प्रभाव के कारण ही होते हैं और गुणों में परिवर्तन के बिना उसको बदला जा नहीं सकता. जीव को खुद भी पता नहीं होता कि वो ऐसा है तो ऐसा क्यों है? इन अलग अलग तीन गुणो के प्रभाव इस तरह होते हैं

तमोगुण–

व्यक्ति में जब तमोगुण की प्रधानता होती है तो उसके दो शेष गुण दबे रहते हैं. और तमोगुण की प्रधानता के कारण ऐसे व्यक्ति के विचार तमोगुनी होंगे. अब जब विचार तमोगुणी होंगे तो उसका व्यवहार तमोगुणी ही होगा. उसमें निद्रा, भय और मैथुन की प्रधानता रहेगी. आलस्य और प्रमादों का आधिक्य रहेगा. ये गहन अंधकार की अवस्था है. अज्ञान अपनी चरम सीमा पर रहेगा लेकिन उसको पता ही नहीं रहेगा कि वो क्या कर रहा है.घोर निराशा, हताशा की हालत होती है. कोई अच्छी बात अच्छी लगती ही नहीं.

ज्ञान या आत्मोकर्ष की अभिलाषा भी नहीं रहती है. जीवन का उद्देश्य खाना पीना और मर जाना बस. ऐसे लोग कभी कभी आत्म हत्या भी कर लेते हैं. ये खुद अशांत रहते हैं और अपने चारो तरफ़ नकारात्मक ऊर्जा बिखेर कर पूरे आस पास के परिवेश को तमोगुण से लबालब भर देत हैं. संतों के हृदय में इनके प्रति करुणा होती है, घृणा नहीं. लेकिन रजोंगुणी लोग इनसे घृणा करते हैं और दूर भागते है. संत और सामान्य जीव में यही तो फर्क है. संत इसीलिए श्रद्धेय होते हैं.

रजोगुण-

जीव में जब रजोगुण की प्रधानता होगी तो उसकी प्राथमिकताए बदल जायेंगी. अब आहार निद्रा भय और मैथुन उसके अंतिम लक्ष्य नहीं होंगे हालाँकि ये सब मौजूद रहेंगे. लेकिन अब उस जीव में प्रचंड क्रिया शक्ति होगी, अब उसको मान-सम्मान, यश, ऐश्वर्य, प्रभुत्व चाहिए होगा. और ये सब किसी भी कीमत पर चाहिए. इन सब चीज़ों के लिए जीव कुछ भी करेगा. उसका ध्यान साधन की शुचिता पर नहीं रहेगा. उसे अब ये सब हासिल करना है और किसी भी शर्त पर हासिल करना है.

वो चोरी करेगा, डकैती करेगा, हत्या करेगा, दंगा-फसाद करेगा या करवाएगा. अपने इन भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वो अपने सभी सम्बन्धों की आहुति दे देगा. भाई, पिता, पत्नी, मित्र किसी को भी धोखा देगा. अपने लक्ष्य की प्राप्ति के सबकुछ करेगा. जिद्द होगी पूरी दुनिया जीत लेने की. सबको पाँव तले रखने की,सब पर शासन करने की. औरंगज़ेब ने अपने पिता को क़ैद कर वर्षों प्रताड़ित किया. सम्राट अशोक ने अपने सौ भाइयों की हत्या कर डाली. कुल मिलाकर ये पागलपन का दौर है.

पावर, पैसा, शान, सत्ता और सम्मान सब चाहिए. चेहरे में तीव्र आक्रामकता होगी और आत्मघाती क़दम उठाने में भी हिचक नहीं होगी. ऐसा जीव ख़ुद में एक तूफ़ान होगा और अपने पूरे परिवेश को तूफ़ानी बनाकर रखेगा. उसके भीतर बहुत बेचैनी रहेगी और सबको प्रभावित करेगा अपनी इस रजोगुनी ऊर्जा से! यदि तमोगुण कम हुआ और सतोगुण तथा रजोगुण दोनो बराबर की हालत में हैं तो ऐसा जीव कुछ रजोगुणों को कम करेगा और कुछ सतोगुण भी. वो यज्ञ भी करेगा, पूजा भी करेगा, ज्ञान की बात भी करेगा. लेकिन सबकुछ यश और सम्मान के लिए करेगा न कि आत्म शुद्धि के लिए. सब मिलकर उसका लक्ष्य भौतिक उपलब्धि पाना ही रहेगा और जीव बेहोश और बेचैन ही रहेगा जीवन भर !

सतोगुण-

ये सर्वोत्कृष्ट गुण है. जिसमें इस गुण की प्रधानता होगी, उसको ज्ञान की, आत्मकल्याण की जिज्ञासा होगी. शांत होगा, शिलवान होगा. क्षमा, दया, करुणा, प्रेम, त्याग, जैसे ईश्वरीय गुण होंगे. किसी में दोष न देखना, अपनी कमज़ोरियों से ऊपर उठना, आत्मचिंतन करना, विनम्रता आदि उसके स्वभाव होंगे. यहीं से आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है और जीवन धन्य होता है. जैसे जैसे सतोगुण में वृद्धि होगी, जीव की लोक में स्वीकार्यता बढ़ेगी,सम्मान बढ़ेगा और उसका आचरण अनुकरणीय होगा. उसकी शांति, उसके आनंद में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाएगी जो कालांतर में सिद्धियों के रूप में प्रकट भी हो सकेंगी.

आत्मघाती जीव ही घृणा नहीं प्रेम और करूण का पात्र है.

हर जीव को आज ना कल इस आत्मिक विकास की प्रक्रिया से एक एक दिन गुजरना ही है. क्योंकि सबको मुक्ति तक की यात्रा करनी है. सारे संत भी गुज़रे हैं. ये जीव के विकास की प्राकृतिक प्रक्रिया है.इसी प्रक्रिया में हम हैं.कोई आगे है कोई पीछे है. इसलिए अहंकारी, उद्दंड और आत्मघाती जीव ही घृणा नहीं प्रेम और करूण का पात्र है. हमें उसमे कुछ दोष दिखता है तो हम में भी दोष है.हम किसी को बदल नहीं सकते.केवल स्वयं को बदल सकते हैं.ये आलेख संक्षिप्त है,विषय बहुत गूढ़ है .मैं ख़ुद अज्ञानी जीव हूँ लेकिन जीवन में जो सीखा और गुरु कृपा से जो मुझे थोड़ी अनुभतियाँ हुई हैं,उनका सार है यह.

आइए हम आत्मचिंतन कर खुद को समझें , अपनी हालत को समझें कि हम कहाँ हैं,और ऊपर उठने की कोशिश करें. घृणा प्रतिशोध आत्मघाती दुर्गुण हैं, हमें मार डालेंगे. शत्रु कोई बाहर नहीं, हमारे भीतर हैं. संघर्ष बाहर नहीं भीतर अपने दुर्गुणो से करना है .और सबसे प्रेम करने का संकल्प लेना है. मुझे पता है कि मेरी ये बातें घोर तमोगुनी और रजोगुनी जीव की समझ से परे हैं लेकिन’जहाँ भी जाएगा, रौशनी लुटाएगा! किसी चिराग़ का अपना मकाम नहीं होता’.

बिहार डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का यह विशेष आलेख “किसी के व्यवहार से दुःखी होना भी अज्ञानता हीं है” केवल उनके लिए है जो आत्म कल्याण के लिए उत्सुक हैं.

अमित राय, बक्सर अप टू डेट न्यूज

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