डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का विशेष आलेख- बिगड़ा मन हीं व्यक्ति का असली शत्रु

ads buxarयह पहले से गिरा मन आदमी के सभी गुणों को मार देता है और अपनी उद्दंडता से बुद्धि कुंठित कर देता है. यह बिगड़ा मन ही व्यक्ति का असली शत्रु है, और इसी को क़ाबू में करने की कोशिश का नाम साधना है. प्रस्तुत हैं पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय का शानदार आलेख जिसे हर किसी को पढ़ना-समझना चाहिए…..

डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का विशेष आलेख- बिगड़ा मन हीं व्यक्ति का असली शत्रु

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ :- गलत लोगों की संगति से स्वाभाविकरूप से चेतना का पतन होने लगता है. विवेक समाप्त जाता है और आदमी मन के अनुसार आचरण करने लगता है. यह पहले से गिरा मन आदमी के सभी गुणों को मार देता है और अपनी उद्दंडता से बुद्धि कुंठित कर देता है. यह बिगड़ा मन ही व्यक्ति का असली शत्रु है, और इसी को क़ाबू में करने की कोशिश का नाम साधना है. प्रस्तुत हैं पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय का शानदार आलेख जिसे हर किसी को पढ़ना-समझना चाहिए…..

सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं, उसी एक परम सत्ता के अंश हैं, तो फिर उनके स्वभाव, संस्कार, व्यवहार और आचरण में इतनी भिन्नता क्यों होती है? ये प्रश्न मैंने हिमालय में रहनेवाले सन्यासी महापुरुष श्री मस्त गिरी जी से किया था. उन्होंने इस प्रश्न का इतने वैज्ञानिक तरीक़े से आध्यात्मिक विश्लेषण किया कि मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. जिज्ञासु आस्तिक भक्तों के लाभ के लिए आप सबों के साथ श्रद्धा और विनय के साथ उसे शेयर कर रहा हूँ. उन्होंने जो बताया, उसको हूबहू आप तक सम्प्रेषित कर रहा हूँ.

वेश भूषा तो उसके व्यक्तित्व के बाहरी अंग है

श्री मस्त गिरी जी ने समझाया कि किसी मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है और इसमें बहुत समय लगता है. इसे समझे बिना किसी व्यक्ति की क्रिया या प्रतिक्रिया को समझना मुश्किल है. व्यक्ति वो नहीं होता जो वह ऊपर से दिखता है या दिखाने की कोशिश करता है. उसका रूप-रंग, उसके शरीर की बनावट, उसकी पोशाक और वेश भूषा तो उसके व्यक्तित्व के बाहरी अंग या आवरण हैं.

असली व्यक्ति तो इसके भीतर छिपा होता है. असली रूप है उसका अंत:करण. अंत:करण यानि उसका मन, उसकी बुद्धि, उसका चित्त और उसके अहंकार. यह अंत:करण ही उसका असली व्यक्तित्व है. यही उसका असली रूप है. उसका बिलीफ सिस्टम उसके इसी अंत:करण में रहता है. इसी बिलीफ सिस्टम से उसकी अवधारणा बनती है, जिससे वह दुनियाँ के व्यापार व्यवहार को समझता है और उसको ग्रहण करता है. फिर जैसे दुनिया के किसी व्यवहार व्यापार को ग्रहण करेगा, जैसी उसकी अवधारणा (पर्सेप्शन) होगी. उसी तरह की उसकी प्रतिक्रिया होगी यानि वैसा ही उसका आचरण और व्यवहार होगा. इसीलिए एक ही स्थिति-परिस्थिति में एक ही समय पर अलग-अलग व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग-अलग होगी.

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है और इसे व्यवहारिक जीवन में रोज देखा जा सकता है. किसी संत को किसी ने गाली दिया, अपमानित किया. अगर वह सचमुच एक संत है और उसकी चेतना सतोगुण में प्रतिष्ठित है तो वह गाली देनेवाले को अज्ञानी समझ कर मुस्कुराता हूवा, बिना दुखी हुए वहाँ से उसके मंगलकामना करते हुए आगे निकल जाएगा. उसकी चित्तवृत्ति शुद्ध है तो उसमें कोई क्रोध, द्वेष या प्रतिशोध-प्रतिकार का भाव ही नहीं उत्पन्न हो सकता. लेकिन ऐसी ही स्थिति हमारे जैसे रजोगुण-तमोगुण जीव के साथ होगी तो हम कैसी प्रतिक्रिया देंगे ये समझा जा सकता है.

किसी को अपमानित करे तो बात हत्या तक पहुँच सकती है

कुछ करने की हालत में किसी कारण वश हम ना भी हों तो मन में कितना आँधी तूफ़ान उठेगा? घृणा, राग-द्वेष की भावना कितनी प्रबल होगी और प्रतिकार-प्रतिशोध का मज़बूत संकल्प भी बनेगा. तीसरे किसी घोर तमोगुण संस्कार वाले किसी अपराधी को बिना कारण कोई गाली गलौज और उसको अपमानित करे तो बात हत्या तक पहुँच सकती है. और फिर ख़ूनी जंग का एक लम्बा दौर भी शुरू हो सकता है. ये सब तो हम रोज अपने अनुभव में देखते ही रहते हैं. अब सहज ही समझा जा जा सकता है कि एक ही स्थिति में अलग अलग लोगों की ये अलग-अलग प्रतिक्रिया उसके अपने अलग-अलग बिलीफ़ सिस्टम/अवधारणा पर आधारित होते हैं.

अब ये समझना है कि व्यक्ति की ये अवधारणा या उसका बिलीफ़ सिस्टम बनता कैसे है? किसी व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि, उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि, शैक्षणिक पृष्ठभूमि, भौगोलिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि इत्यादि अनेक महत्वपूर्ण बाह्य कारक हैं जो उसके बिलीफ़ सिस्टम को बनाते है, उसकी अवधारणा बनाते हैं. अपने माता पिता के स्वभाव, संस्कार, उनके मूल्य और उनकी अवधारणा का हमारे ऊपर गहरा प्रभाव पड़ता है. इसे विस्तार से समझने की आवश्यकता नहीं है.

इसी प्रकार जिस सामाजिक परिवेश में हम पले-बढ़े उस समाज की मान्यताएँ, परम्पराएँ, मूल्य सब हमारे मन पर गहरे प्रभाव डालते है. जिस प्रकार का सांस्कृतिक धार्मिक परिवेश मिला, वह हमारे बिलीफ़ सिस्टम का स्वाभाविक अंग बन जाता है. तभी तो बिना प्रयास और बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के मुसलमान का बालक मुसलमान, हिंदू का बालक हिंदू, ईसाई का बालक ईसाई स्वत:ही बन जाता है. क्योंकि उसी तरह उसकी परवरिश हुई है. वह चाहे अनचाहे अपने परिवार और अपने समाज के बिलीफ़ सिस्टम को सहज ही स्वीकार करता जाता है और कमोबेश वैसा ही हो भी जाता है.

यहाँ अपवाद की बात नहीं रही. सामंत नियम की बात हो रही है. अपवाद हर नियम के हो सकते हैं पर सामान्य और सर्वमान्य सिद्धांत तो यही है. इसी प्रकार दक्षिणपंथी विचारधारा वाले परिवेश में परवरिश होने से दक्षिणपंथी, वामपंथी परिवेश में वामपंथी, धर्म निरपेक्ष माहौल में रहने से सब धर्मों के प्रति समान आदर का भाव वाले संस्कार सहज रूप सेस्वाभाव में आ जाते हैं.

परिवेश से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है

किसी व्यक्ति का आस्तिक या नास्तिक होना भी उसकी संगति और उसके परिवेश पर बहुत हद तक निर्भर करता है. इस प्रकार व्यक्तित्व निर्माण एक बहुत जटिल प्रक्रिया है जिसे सुगमता से समझाने के लिए ये कुछ सरल उदाहरण दिए गए है. संक्षेप में कहें तो हर परिवार, हर क़ौम, हर समाज, हर समुदाय और हर देश की परम्पराएँ, मान्यताएँ, संस्कृतियाँ और संस्कार अपने नागरिक के जीवन मूल्यों पर एक गहरा प्रभाव छोड़ते हैं जिससे उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है.व्यक्ति इन बाह्य कारकों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता.

आज का मूल्यहीन शैक्षणिक परिवेश व्यक्ति के बिलीफ़ सिस्टम को बनाने अपनी अलग भूमिका निभाता है. मदरसे में पढ़नेवाले, ईसाई मिशनरियों के स्कूल में पढ़नेवाले, किसी हिंदू संगठन द्वारा संचालित स्कूल में पढ़ने वाले, किसी वामपंथी संस्था द्वारा संचालित या किसी धर्म निरपेक्ष गणराज्य द्वारा संचालित स्कूल में पढ़नेवाले बच्चों की सोच में फ़र्क़ होना स्वाभाविक है. इसी प्रकार साहित्य के विद्यार्थी, गणित या विज्ञान के विद्यार्थी और दर्शन के विद्यार्थी की समझ बिलकुल एक जैसी कैसे होगी?

भाषा के साथ उसके मूल्य और संस्कार भी तो जुड़े होते हैं

साहित्य में भी संस्कृत के विद्यार्थी और अंग्रेज़ी के विद्यार्थी की पहचान और समझ एक दूसरे से थोड़ी अलग होगी. क्योंकि किसी भाषा के साथ उसके मूल्य और संस्कार भी तो जुड़े होते हैं.वो सहज ही हमारे बिलीफ़ सिस्टम का हिस्सा बन जाते है. इसी प्रकार हमें जिन लोगों ने शिक्षा दी है, उनके स्वभाव, संस्कार और उनके बिलीफ़ सिस्टम की बहुत सी चीज़ें अनायास हमारे अवचेतन में जगह बना लेती हैं.

इसके अतिरिक्त हमारे जीवन के व्यक्तिगत अनुभव हमारे बिलीफ़ सिस्टम में बहुत गहराई के साथ बैठ जाते हैं. और कभी कभी ऐसा पूर्वग्रह बना देते हैं कि हमारे सोच की दिशा ही बदल जाती है. ये अनुभव सकारात्मक या नकारात्मक दोनो तरह के सकते है. जैसे किसी आदमी को किसी स्थान विशेष या क़ौम विशेष के १०० लोगों से जीवन में धोखा मिला.

उस व्यक्ति के बिलीफ़ सिस्टम में यह बात बैठ जाएगी कि अमुक स्थान या अमुक क़ौम के लोग धोखेबाज़ ही हैं. यद्यपि यह सत्य नहीं है किंतु फिर भी अब उस व्यक्ति के मन से इस बात को निकालना बहुत मुश्किल होगा. ये निजी अनुभव मन में इतने गहरे बैठते हैं कि इनको बाहर निकालना बड़ा ही मुश्किल होता है. आस्तिक और नास्तिक होने का कमल भी बहुत हद तक निजी अनुभूति पर आधारित है. भले वह अनुभूति इस जन्म की ना होकर पिछले जन्म की हो वर्ना बिना इस जन्म में किसी प्रत्यक्ष प्रमाण के भी कोई क्यों ज़िद्दी आस्तिक होता है .क्योंकि पूरे जन्म की कृपा की कोई अनुभूति उसके अंत:कारण में सुरक्षित है, संचित है.

इसी प्रकार जो घोर नास्तिक है वह भी कभी घोर आस्तिक हो सकता है, क्योंकि जन्म जन्मो की इस अनंत यात्रा से उसको भी कभी ना कभी इस अनुभूति से गुजरना ही है.यह कभी भी हो सकता है क्यों कि नास्तिक भी उसी परम सत्ता का अंश है और उस पर भी ईश्वर की उसी तरह कृपा बरसती है जिस तरह आस्तिक पर.

निजी अनुभवों के बाद विभिन्न श्रोतों से किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे में प्राप्त सूचनाएँ भी अनजाने में हमारे बिलीफ़ सिस्टम में समा जाती हैं. जैसे किसी के बारे में सैकड़ों आदमी से एक ही तरह की बात, व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर उसको बुरा या अच्छा मान लेना. ये बहुत ख़तरनाक अवधारणा है. इसके कारण ही किसी ईसा-मसीह को लोग शूली पर लटका देते हैं. या किसी राम रहीम के चक्कर में उसको सिर पर बिठा कर अपना सिर धुनते हैं.

ऐसी ख़तरनाक सूचनाएँ, अनचाही चीजें हमें निजी स्वार्थ के कारण लिखी गयी नास्तिक लोगों की किताबों से, टीवी से, इंटरनेट से अफ़वाहों से या अन्य हज़ारों श्रोतों से हमारे बिलीफ़ सिस्टम में प्रवेश कर जाती हैं. और ये हमें वैसा ही सोचने और उसी सोच के अनुसार व्यवहार करने को विवश कर देती हैं. इस प्रकार हम अनजाने में ही दूसरों के बिलीफ़ को अपनाते अपनाते कन्फ़्यूज़्ड व्यक्तित्व वाले इंसान बन जाते हैं क्योंकि भीतर जो भी संकलित हुवा है, वह बाहर से अलग अलग बिलीफ सिस्टम से आया है. और तमोगुण और रजोगुण के गहन प्रभाव के कारण अपनी मोहित बुद्धि से सही निर्णय लेने में अक्षम होते हैं.

गलतियाँ करते जाते हैं और अपनी चारो तरफ नकारात्मक ऊर्जा बिखेरने लगते हैं. ताज्जुब इस बात का है कि हमें अपनी इस बीमारी का पता भी नहीं होता और दूसरा संकेत करे तो हम उसे अपना शत्रु मान लेते हैं. गलत सलाह देने वाले शुभेक्छु लगते हैं। इस तरह गलत लोगों की ही संगति बनती जाती है जिसका स्वाभाविक परिणाम चेतना का पतन है. तब विवेक समाप्त जाता है और आदमी मन के अनुसार आचरण करने लगता है. यह पहले से गिरा जीव मन आदमी के सभी गुणों को मार देता है और अपनी उद्दंडता से बुद्धि कुंठित कर देता है. यह बिगड़ा मन ही व्यक्ति का असली शत्रु है,और इसी को क़ाबू में करने की कोशिश का का नाम साधना है.अमित राय, बक्सर अप टू डेट न्यूज

इसे भी पढ़े :——————————

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
Insatall APP
live TV
Search
facebook