सिद्धाश्रम बक्सर की पावन धरा प्रेरणादायक- मोरारी बापू

सिद्धाश्रम बक्सर की पावन धरा प्रेरणादायक है। महर्षि बाल्मीकि ने अपने रामायण में जिसे सिद्धाश्रम कहा उसे गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस में इसे शुभ आश्रम कहा है। “विश्वामित्र महामुनि ज्ञानी।
बसहिं विपिन शुभ आश्रम जानी।।”

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सिद्धाश्रम बक्सर की पावन धरा प्रेरणादायक- मोरारी बापू

बक्सर अप टू डेट न्यूज़/ एo एन० चंचल :- सिद्धाश्रम बक्सर की पावन धरा प्रेरणादायक है। महर्षि बाल्मीकि ने अपने रामायण में जिसे सिद्धाश्रम कहा उसे गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस में इसे शुभ आश्रम कहा है। “विश्वामित्र महामुनि ज्ञानी।
बसहिं विपिन शुभ आश्रम जानी।।”

यहां राम चरित का गायन कर स्वयं को धन्य करना है। यह बातें सिय पिय मिलन महोत्सव के 50वें वर्ष पर आयोजित श्री रामकथा में मुरारी बापू ने सिद्धाश्रम बक्सर में कहा। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र, महर्षि खाकी बाबा एवं श्री मामा जी समेत बक्सर के संत चेतना एवं यहाँ की प्रवाहित परंपरा को नमन करते हुए मानस अहल्या की शुरुआत की। कथा को आगे बढ़ाते हुए बापू ने कहा कि श्रीरामचरितमानस सात तीर्थों का महासंगम है। इसके प्रत्येक सोपान सप्तपुरी के रूप में परिलक्षित है। बालकांड अयोध्या, अयोध्या कांड मथुरा, अरण्यकांड प्रयाग, किष्किंधा कांड काशी सुंदरकांड कांची, लंका कांड अवंतिका एवं उत्तरकांड द्वारका के रूप में विराजमान है।

मानस के गायन एवं श्रवण से सप्तपुरी में अवगाहन का सुख प्राप्त होता है। मानस अहल्या पर बोलते हुए मोरारी बापू ने कहा कि इस सिद्ध एवं शुभ भूमि पर तीसरी बार नौ दिनों तक रामकथा गायन का अवसर प्राप्त हुआ है। पहली बार मानस- विश्वामित्र, दूसरी बार मानस -श्रद्धा एवं अब तीसरी बार मानस- अहल्या पर सात्विक- तात्विक संवाद करने आया हूँ। मामा जी के भक्ति रूपी मयखाने पर राम कथा रस पीने तथा कुछ पिलाने भी आया हूँ। मानस अहल्या कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने आश्रम की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि आश्रम वहीं हैं जहां बिन मांगे आशीर्वाद मिले, जहां आराम मिले,जहां वेद का ज्ञान मिले, जिस स्थान पर आरोग्य की प्राप्ति हो,जहां निराधार को आधार मिले, हारे को आश्वासन मिले, अकारण ही आनंद की प्राप्ति हो, जहाँ स्वाभाविक आकर्षण प्राप्त हो एवं जहां हमारे अंदर नया अविष्कार होने लगे ।

प्रभु श्री राम का सिद्धाश्रम में आना माता अहिल्या के मौन साधना का प्रतिफल है।

बापू ने कथा को आगे बढ़ाते हुए अहल्या शब्द की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि, “अहल्या शब्द का अर्थ गुजराती शब्दकोश में क्षमा अर्थात माफ करना होता है।” प्रभु श्री राम का सिद्धाश्रम में आना माता अहिल्या के मौन साधना का प्रतिफल है। उन्होंने घटना वृत्तांत को संक्षेप में बताया कहा कि इंद्र से छलने और ऋषि के छोड़ने के बाद अहिल्या ने युगों तक मौन साधना की। इससे पहले ब्रह्मा द्वारा निर्मित अपने युग की सबसे सुंदर स्त्री में उनकी गणना होती थी।

परन्तु श्रापित होने के बाद तरह तरह की विभिन्न यातनाओं के बावजूद अहल्या ने किसी के प्रति कटु शब्द का प्रयोग नहीं की है और न ही किसी के प्रति शिकायत का भाव उनके मन में रहा। उन्होंने कहा कि गौतम ऋषि के कटु वचनों ने उन्हें कठोर बना दिया था। उन्होंने उसके बाद किसी से कोई वचन बोला ही नहीं केवल अपने को साधा। बापू ने उपस्थित श्रद्धालुओं से कड़वा बोलने से परहेज करने की बात कही। उन्होंने ने हनुमानजी के ननिहाल की भी चर्चा की और कहा कि यही हनुमान जी का ननिहाल भी रहा है और अहल्या मेरे हनुमान की नानी हैं।

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