प्रभु की परीक्षा नहीं उनकी प्रतीक्षा करनी चाहिए-मोरारी बापू

उन्होंने कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि राम कथा का प्रारंभ शिव कथा के बिना नहीं हो सकता। राम कौन है परीक्षा का विषय नहीं है? प्रतीक्षा का विषय है। ब्रह्म परीक्षा का विषय नहीं है प्रतीक्षा का विषय है। प्रभु की परीक्षा नहीं उनकी प्रतीक्षा करनी चाहिए

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बक्सर अप टू डेट/ए0एन0चंचल- हनुमानजी के ननिहाल की पावन धरा पर नौ दिवसीय श्रीराम कथा के चतुर्थ दिवस पर मानस अहल्या को केंद्र में रखते हुए सात्विक तांत्रिक चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अंतर्राष्ट्रीय संत राम कथा वाचक मुरारी बापू ने कहा कि प्रभु जिस को पकड़ रखते हैं न वो कभी नहीं डूबते हैं परन्तु जिसे छोड़ देते हैं या तो फेंक देते हैं वो तो डूब ही जाता है।

हरि के प्रताप से बड़ी-बड़ी चट्टानें तैर जाएं बंदरों के हाथों से डाली गई चट्टाने रामप्रताप से तैर जाएं और प्रतापपुंज मेरे राघवेंद्र, सूर्य का सूर्य, यह परमात्मा एक कंकड़ लेकर अपने हाथ से डाले तो क्या न तैरे। यह तो अच्छा भाव है कि आप छोड़ दो तो डूब जाए पकड़ रखो तो तैर जाएं लेकिन यह भी तो व्यवहार में गलत है कोई तैरता है तो पकड़ रखो तो वो कैसे तैरेगा।

राम का हाथ छुए, राम के आश्रित,जिसके सिर पर राम का हाथ है, ऐसे आश्रित बंदरों के हाथ से, रामप्रताप से अथवा तो राम नाम लिख दिया जाए तो पत्थर तैर जाए और राम के हाथ से कंकड़ ना तैरे। कोई बुद्धि में बैठने वाली बात नहीं है।

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अहल्या के प्रसंग में भगवान राम ने इसका जवाब दे दिया है। मेरे हाथों से पत्थर तैरे, नाम से पत्थर तैरे, यह तो दूर की बात है। पद पंकज धूरी। हवा के झोंके से प्रभु का चरण रज गिरा और अहल्या तर गई। राम तारक है। राम मंत्र तारक मंत्र भी है। यही रज मुनी पत्नी तरी। सो ढूढत गजराज। हमारे देश का प्राणी भी वही रज ढूंढता है।

मानस प्राकट्य पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार त्रेता युग में नवमी के दिन प्रभु प्रकट हुए, प्रभु श्री राम का प्रादुर्भाव हुआ। ठीक उसी प्रकार संवत 1631 में रामनवमी के दिन रामचरितमानस का प्राकट्य हुआ। तुलसीदास जी के लेखनी का अवतार हुआ, कलमावतार हुआ और सम्पूर्ण सभ्यता को जो हमारी प्रवाह थी उसका उसने रक्षण किया है।

न्याय दर्शन के प्रवर्तक ही गौतम ऋषि हैं।

बिहार में हुई शराब बंदी और दशरथ मांझी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जो वंदनीय है उसकी वंदना होनी चाहिए, उसको अवार्ड मिलना चाहिए। यह अपने अपने स्वभाव की बात है कि बाकी किसी में विशेषता आए तो उसको अवार्ड दिया जाए। उसकी वंदना की जाए उतना ही जरूरी है। हम आलोचना नहीं कर सकते क्योंकि हम स्वयं देते हैं। जिन्होंने कोई विशिष्ट क्षेत्र में अपना जीवन जिया हो उसकी वंदना होनी चाहिए। उसकी शयन आरती नहीं करनी चाहिए उसकी श्रृंगार आरती कर लेनी चाहिए।

उन्होंने अपने श्रद्धालुओं से अपील करते हुए कहा कि नशीले पदार्थों का सेवन कम करें और धीरे-धीरे ही सही उसको छोड़ दे। चाय पीना भी एक प्रकार का व्यसन है। एक सूफी संत के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति जाता और पूछता है कि आपको कोई जरूरत नहीं होती। आपकी क्षमता देखकर तो लगता है कि पूरी की पूरी कायनात आपके चरणों में रख दे तो वो भी तुच्छ है, और आप इन सब से दूर रहते हैं, असंग बिल्कुल।

बाबा बोले ऐसी बात नहीं है बस पांच वस्तु कबूल करता हूं। ये वस्तु हैं- खाना,पीना,पहनना इत्यादि। परमात्मा का दिया हुआ सबकुछ तो है मेरे पास। खाना उतनी मात्रा में खानी चाहिए जितना से प्राण बचे जीवित रह सके और परमात्मा का दिया वह मेरे पास सबसे बड़ा अवार्ड है। मेरा जन्म हुआ इसके पहले ही जिसने मेरी मां के वक्ष में दूध दे दिया यह अवार्ड ही तो है। कपड़ा उतना ही पहनना चाहिए जिससे कि देह की मर्यादा बनी रहे। राम गरीब नवाज हैं। जिसको रौरव मिलना चाहिए उसको गौरव मिल गया। यह तो मेरे राम की बात है।

राम नाम की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कि नाम जप में दिशा नहीं होती, नाम जप में तो दशा होती है। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ। कलियुग केवल एक अधारा। गावत नर पावहि भव पारा।।

उन्होंने कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि राम कथा का प्रारंभ शिव कथा के बिना नहीं हो सकता। राम कौन है परीक्षा का विषय नहीं है? प्रतीक्षा का विषय है। ब्रह्म परीक्षा का विषय नहीं है प्रतीक्षा का विषय है।

बापू ने अपने कथा के दौरान गीत-संगीत एवं शेरो-शायरी  सुना कर खुशनुमा कर दिया। जय सियाराम के साथ ही चतुर्थ दिन की कथा का विश्राम हुआ।

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