पंचकोशी मेला : भगवान राम को लगता है हर घर में आज लिट्टी-चोखा का भोग

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ :-जिला में लगने वाले पंचकोशी मेला का आज अंतिम दिन है। पांच दिनों तक चलने वाले इस मेले के अंतिम दिन लिट्टी-चोखा बनाया जाता है। रामायण काल से चली आ रही मान्यता के मुताबिक, लिट्टी-चोखा का भोग सबसे पहले भगवान श्री राम को लगाया जाता है।

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पंचकोशी मेला के अंतिम दिन पूरे बक्सर के घरों में भी लिट्टी-चोखा बनाने की परंपरा है। इसे शुभ माना जाता है। मंत्री से लेकर विधायक भी यहां आकर लिट्टी-चोखा बनाते हैं। धरा धाम पर ईश्वर का अवतार होता है। यों तो हमारे शास्त्रों और संतों ने ईश्वर के अनेक अवतार बताये हैं किन्तु चौबीस सर्वविदित है। उन चौबीस में दस प्रमुख और उनमें भी दो श्रीराम और श्रीकृष्ण प्रमुख हैं। इन दो पावन अवतारों की चर्चा वेद, उपनिषद, पुराण, शास्त्र और अन्यान्य ग्रंथों में सर्वत्र प्राप्त होता है। भगवान के अवतार के बहुत सारे प्रयोजन हैं। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि जब उनके भक्तों द्वारा करुण पुकार होती हैं तब अपने को रोक नहीं पाते हैं।

श्रीराम अवतार की योजना भी ऐसे ही बनी। मनु और शतरुपा की आर्त पुकार पर प्रकट होने का वरदान दिए और दशरथ कौशल्या बनने पर अपने अंशों सहित चार रुपों में प्रकट हुए। फिर सिद्धाश्रम बक्सर के महामनीषि विश्वामित्र की यज्ञ रक्षा हेतु छोटे भाई लक्ष्मण सहित आये। यज्ञ की संपन्नता के बाद सिद्धाश्रम बक्सर निवासी संतों के आश्रम में आतिथ्य स्वीकार किए। उसी कालखंड से अर्थात त्रेता युग से सिद्धाश्रम की पंचकोशी परिक्रमा का विधान बना है। जो आज भी जीवित हैं और भविष्य में भी रहेगा।

अगहन महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से यह परिक्रमा प्रारंभ होती है तथा नवमी के दिन सम्पन्न होती है। पहला पड़ाव अहिरौली में जहाँ गौतम पत्नी अहल्या का उद्धार किए। दूसरा पड़ाव नदाव गांव में जहाँ नारदजी रहा करते थे और आज भी नारद कुंड विद्यमान है। तीसरा पडाव भभुवर में जहाँ भृगु जी का आश्रम है। पांचवां पड़ाव नुआंव गांव में उद्दालक जी के आश्रम में और छठ्ठा चरित्र वन में लिट्टी चोखा के भोजन के साथ संपन्न होता है।

माई बिसरी चाहें बाबू बिसरी

माई बिसरी चाहें बाबू बिसरी
पंचकोसवा के लिट्टी चोखा ना बिसरी।
आईल पंचकोश हो चलीं जा परिक्रमा करे।
लगाई अयिनी हो पंचकोशी परिकरमा।
बक्सर सिद्धाश्रम परिक्रमा पंचकोशी अगहन में चल लगाई आईं जा।
आये रघुनाथ विश्वामित्र जी के साथ
कीन्हें मुनी गण सनाथ अपनी अभय बांह छांह दे।
असुरन सहारे यज्ञ कारज संवारे सारे
स्वारथ परमारथ सम्यक निर्वाह दे
प्रभु ने स्वीकारे सबकी कुटिन्ह में पधारे
नेहनिधि हित पंचकोशी परिक्रमा की राह दे।

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