हरिद्वार स्थित आदिनाथ अखाड़ा में ब्रह्मलीन हुए नाथ बाबा

आदिनाथ अखाड़ा ( नाथ बाबा घाट) को स्थापित करने वाले श्रीआदिनाथ पीठाधीश्वर श्रीत्रिलोकी नाथ महाराज (नाथ बाबा) की हरिद्वार स्थित आदिनाथ अखाड़ा में ब्रह्मलीन हो गए|

student lone buxarहरिद्वार स्थित आदिनाथ अखाड़ा में ब्रह्मलीन हुए नाथ बाबा

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ :- शहर के चरित्रवन स्थित आदिनाथ अखाड़ा ( नाथ बाबा घाट) को स्थापित करने वाले श्रीआदिनाथ पीठाधीश्वर श्रीत्रिलोकी नाथ महाराज (नाथ बाबा) की हरिद्वार स्थित आदिनाथ अखाड़ा में ब्रह्मलीन हो गए| ब्रह्मलीन की खबर सुन बक्सर समेत पुरे देश में भक्तो में शोक की लहर दौड़ गई|

बताया जा रहा है की 4 अप्रैल से 14 अप्रैल तक अतिरुद्र यज्ञ के आयोजन के बाद बाबा ने अन्न-जल का त्याग कर दिया था| रविवार को दिन में करीब 3:00 बजे उन्होंने समाधि ले ली| बताया जा रहा है की बाबा ने अपने शिष्यों को बता दिया था की 18 को अपने जीवन का त्याग करूंगा| नाथ बाबा का अंतिम संस्कार सोमवार को हरिद्वार में किया जाएगा|

बता दें कि श्री आदिनाथ अखाड़ा, श्री नाथ आश्रम, चरित्रवन, बक्सर रेलवे स्टेशन से 1.5 किमी दूर प्रकृति के सुंदर वातावरण में गंगा और सोन नहर के संगम पर स्थित है. चरित्रवन का एक अति प्राचीन नाम सिद्धाश्रम है. श्रीमद् वाल्मीकि रामायण, शिव पुराण, विष्णु पुराण, नारद पुराण, अग्नि पुराण आदि प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख एक महान तीर्थ के रूप में हुआ है. यहाँ नवनाथ चौरासी सिद्धों ने दीर्घ काल तक तपस्या की थी. खुदाई से प्राप्त कुण्डल धारण करने वाली मिट्टी की मूर्तियों से यह तथ्य प्रमाणित होता है.

1967 में मूर्तियों की स्थापना तथा यज्ञ का अनुष्ठान हुआ

कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को सिद्धों ने प्रामाणिकता प्रदान कर इस स्थान का नाम सिद्धाश्रम रखा था. वामनेश्वरनाथ, सोमेश्वरनाथ, रामेश्वरनाथ, गौरीशंकरनाथ, नारदेश्वरनाथ आदि विश्रुत शैव पीठों के मध्य श्री आदिनाथ अखाड़ा आध्यात्मिक उर्जा एवं शिव की उपासना का केंद्र है. यद्यपि यह अनादि तीर्थ है, किंतु वर्तमान समय में इसका पुनरूथान श्री आदिनाथ पीठाधीश्वर श्री त्रिलोकिनाथ जी महाराज (श्री नाथ बाबा) के द्वारा 1964 में प्रारंभ हुआ एवं सन् 1967 में मूर्तियों की स्थापना तथा यज्ञ का अनुष्ठान हुआ. सन् 1977 के प्रयाग महाकुंभ में महारूद्र यज्ञ के अनुष्ठानपूर्वक श्री आदिनाथ अखाड़े का विधिवत उद्घाटन हुआ.

तब से चारों महाकुंभों एवं अर्द्धकुंभों में अखाड़े का शिविर स्थापन, यज्ञानुष्ठान एवं शाही स्नान की परंपरा चली आ रही है. शुद्ध आचरण, सात्विक आहार विहार का आधार लेकर योग के द्वारा नादानुसंधान के क्रिया से शिव तत्व की प्राप्ति इस अखाड़े की साधना का लक्ष्य है.

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