माई बिसरी, चाहे बाबू बिसरी,पंचकोसवा के लिट्टी चोखा

भोजपुरी में कहा भी जाता है कि, माई बिसरी, चाहे बाबू बिसरी…पंचकोसवा के लिट्टी चोखा नाहीं बिसरी।।

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माई बिसरी, चाहे बाबू बिसरी,पंचकोसवा के लिट्टी चोखा

बक्सर अप टू डेट न्यूज़/ए ० एन ० चंचल :- हमारा भारत देश विविधताओं से भरा देश है। यहाँ विभिन्न प्रकार के धर्म, पहनावा, बोलचाल, रंग-रूप, खान-पान मौजूद है। इस भारत देश में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों पर आधारित त्योहारों का आयोजन किया जाता है। यथा खिचड़ी मेला, सतुवान मेला, लोहड़ी, पोंगल इत्यादि।

उसी तरह पंचकोसी परिक्रमा अर्थात लिट्टी चोखा मेला भी है। यह बिहार का प्रसिद्ध मेला है। जो रामायणकाल से ही बक्सर (सिद्धाश्रम) में हर वर्ष अगहन मास के कृष्ण पक्ष पंचमी से शुरू होकर नवमी तक चलता है। पंचकोसी परिक्रमा अपने आप में एक अद्भुत मेला है। जहां 5 दिनों में 5 कोस की दूरी तय कर पांच अलग-अलग स्थानों पर पड़ाव डाले जाते हैं और अलग-अलग प्रकार के व्यंजन का प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह पंचकोसी परिक्रमा अहिरौली से शुरू हो कर चरित्रवन में विश्राम लेता है। पहले दिन ऋषि गौतम और माता अहिल्या के आश्रम अहिरौली में पकवान, दूसरे दिन नारद मुनि के आश्रम नदांव में सतु-मूली, तीसरे दिन भृगु मुनि के आश्रम भभुवर में दही-चूड़ा,चौथे दिन ऋषि उद्दालक के आश्रम उनुआव में खिचड़ी-चोखा और पाँचवे दिन यानी अंतिम दिन विश्वामित्र मुनि के आश्रम चरित्रवन में लिट्टी और चोखा का प्रसाद ग्रहण करते हैं।

भोजपुरी में कहा भी जाता है कि, माई बिसरी, चाहे बाबू बिसरी…पंचकोसवा के लिट्टी चोखा नाहीं बिसरी।।

मान्यताओं के अनुसार महर्षि विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम में पधारकर श्रीराम-लक्ष्मण ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का संहार किया और महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ को पूरा कराया। ततपश्चात ऋषि मुनियों ने अपने आश्रम में श्रीराम-लक्ष्मण को पधारने का और आतिथ्य स्वीकार करने का आग्रह किया। उनके आग्रह को उन्होंने स्वीकार किया और कुछ दिन यहाँ रहकर ऋषियों-मुनियों से मिले और अलग अलग जगहों पर अलग अलग व्यंजनों का प्रसाद ग्रहण किये और उनसे आशीर्वाद लिया।

इसका वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री राम चरित्र मानस में संकेत किया है , ” तह पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्ह विप्रन्ह पर दाया।। भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे विप्र जद्यपि प्रभु जाना।।” प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जिस आश्रम में जो प्रसाद ग्रहण किये थे वही प्रसाद आज भी लोग उस स्थान पर ग्रहण करते हैं।
राष्ट्रीय संत श्री नारायण दास भक्तमाली उपाख्य मामाजी महाराज ने पंचकोसी परिक्रमा के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा है कि- आये रघुनाथ, विश्वामित्र जी के साथ, कीन्हें मुनि गण सनाथ, अपनी अभय बाँह-छाँह दै।
असुरन्हि संहारे, यज्ञ कारज सँवारे, स्वारथ परमारथ को सम्यक निर्वाह दै।।मुनि जन मिलि सारे, राम-लखन को दुलारे, निज निज आश्रमनि हँकारे, आतिथ्य की सलाह दै। प्रभु ने स्वीकारे , सबकी कुटिन्ह में पधारे, नेहनिधि हित पंचकोसी परिक्रमा की राह दै।।

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