मामा की नगरी में तो हास्य विनोद तो होना ही चाहिए

नौ दिवसीय श्रीरामकथा अंतर्गत मानस अहिल्या को केंद्र में रखते हुए पंचम दिवस के कथा की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय संत श्रीराम कथा वाचक मोरारी बापू ने हास्य रस के साथ की। उन्होंने कहा कि मामा की नगरी में सिय पिय मिलन महोत्सव में आये हैं तो हास्य विनोद तो होना ही चाहिए।

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मामा की नगरी में तो हास्य विनोद तो होना ही चाहिए

बक्सर अप टू डेट/ए0एन0चंचल- जटाशंकरी गंगा के तट पर महा मुनि विश्वामित्र जी के शुभ आश्रम में सिय पिय मिलन महोत्सव के अवसर पर पूज्य खाकी बाबा एवं मामाजी के पुण्यस्मृति में आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा अंतर्गत मानस अहिल्या को केंद्र में रखते हुए पंचम दिवस के कथा की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय संत श्रीराम कथा वाचक मोरारी बापू ने हास्य रस के साथ की। उन्होंने कहा कि मामा की नगरी में सिय पिय मिलन महोत्सव में आये हैं तो हास्य विनोद तो होना ही चाहिए।

बापू ने कहा कि मेडिकल साइंस और मनोविज्ञान दोनों ही ये कलाएँ हैं। आज का जितना एडवांस मेडिकल साइंस है, आज के जमाने में जितना मनोविज्ञान आगे बढ़ा है। अपने-अपने प्रयोग के द्वारा अपना-अपना मत होता है। लेकिन कई बातों में एक राय है और उसमें एक राय यह है कि आप जितने प्रसन्न रहो सको उतनी मात्रा में आपके शरीर में रोग कम होंगे। मैं विज्ञान का एक साधारण सूत्रपात कर रहा हूं और व्यासपीठ से कर रहा हूं। और मेरी जिम्मेवारी है। संतों की उपस्थिति में कर रहा हूं। वह और बढ़िया है। मैं सभी को कहना चाह रहा हूं कि जितना आप प्रसन्न रहोगे इतनी मात्रा में आप की बीमारी को शरीर निकालेगा।

शरीर औषधि बन जाएगा।

लेकिन प्रश्न ये है कि यह प्रसन्नता आए कैसे? व्यासपीठ का भी एक अपना विज्ञान है। व्यासपीठ के विज्ञान के अनुसार प्रसन्नता आती है पवित्रता से। पवित्रता आती है परमात्मा के नाम संकीर्तन से, परमात्मा के गुण कथन से, परमात्मा के दिव्य लीलाओं के श्रवण से,पवित्रता से प्रसन्नता आती है और प्रसन्नता आती है तो बिन बुलाए निरोगिता आती है।

जानकी जी की सुंदरता सुंदरता को भी सुंदरता कर देती है और प्रभु का नाम पवित्रता को भी पवित्र कर देता है। भगवत कथा सोने वाले को और सुला देती है और जागने वाले को और जगा देती है। विश्राम को भी विश्राम देती है। व्यासपीठ कभी कथा के दौरान नहीं सोता है क्योंकि दुनिया को जगाना है।st join buxar

बापू ने कहा शिव जी कहते हैं। जिस कर्म को करने से स्वयं में अहंकार आ जाए अथवा दूसरे को ईर्ष्या हो जाए। वह कार्य नहीं करना चाहिए।

भगवत कथा का क, ख,ग, घ, च,छ, ज है। कथा का क है कथाकार को निरंतर कथा को केंद्र में रखनी चाहिए और संदर्भ लेनी चाहिए। उसका ख है- सभी साधकों का अपना एक इष्टग्रंथ होना चाहिए। अपना एक इष्ट मंत्र होना चाहिए। अपना इष्ट देव होना चाहिए होना। अपना इष्ट गुरु होना चाहिए। डर ना खरोसो। तीसरा कथा कुल के लिए ग है व्यासपीठ से कभी गलत निवेदन नहीं करना। घ है- घराना कभी भूलना नहीं। हम कथाकारों का घराना महादेव/ कागभुसुंडि/ गोस्वामी तुलसीदास जी अथवा जिससे हमें प्रेरणा मिली हो, वो है। कथा जगत का च है- चतुराई नहीं होनी चाहिए। छ है- क्षमा भाव होना चाहिए। ज है- जप करते रहना। ना कर सको तो कथा ही स्वयं जप यज्ञ है।

जिंदगी को मैंने इस कदर सुलझा लिया। किसी से माफी मांग ली, और किसी को माफ कर दिया।।

अहल्या जी के रूप का चांचल्य उनसे भूल करा गया। रूप के साथ एक शब्द कायम होना चाहिए खासकर वे माताओं के लिए। माता रूपवती हो,यह परमात्मा की कृपा है लेकिन जिस रूप में शील नहीं है, उस रूप का कोई अर्थ नहीं है। मानस के अनुसार नारियों अवगुण है- साहस, चपलता,भय, अविवेक, अशौच, निर्दयता जैसे गुणों से नारी कमजोर होती हैं। पत्थर हो जाना निर्दयता का प्रतीक है। शील का जब संग्रह हो जाता है तब शीला बन जाता है।

जीवन में और कुछ रिपेयर करने जैसा नहीं है। कोई पहुंचें हुए फकीर भले ही दुनिया पागल कहती है। इससे तीन नट बोल्ट हैं सत्य, प्रेम, करुणा।

तत्पश्चात कथा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने शिव विवाह की चर्चा की। अंततः राम जन्म का वर्णन करके भाव विह्वल कर दिया। उन्होंने खीर की चर्चा करते हुए कहा कि चावल कर्म योग है, दूध है ज्ञान, चीनी है भक्ति योग। जब ये तीनों मिलते हैं तब हमारे राम का प्राकट्य होता हैं। अंततः राम जन्म का वर्णन करके भाव विह्वल कर दिया। राम जन्म के बधाई के साथ ही पंचम दिवस की कथा का विश्राम हुआ।

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