परमात्मा को पाना है तो प्रेम करना होगा- बापू

स्वाध्याय ये परायण है, ये प्राणायाम है। कथा हमें परमात्मा परायण, सत्य के, प्रेम के, करुणा के परायण बना देती है। कथा सूत्रों का संगम है। अतः परमात्मा को पाना है तो प्रेम करना होगा

ads buxar

परमात्मा को पाना है तो प्रेम करना होगा- बापू

बक्सर अप टू  डेट /ए० एन०चंचल – मोह महीश कालिका भगवती गंगा के तट पर महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि सिद्धाश्रम बक्सर में नौ दिवसीय श्री राम कथा जो परम पूज्य खाकी बाबा महाराज की पुण्य स्मृति में और नेह निधि मामाजी के पुण्य स्मरण में श्री सीताराम विवाह महोत्सव के स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित हो रहा है। इसके अंतर्गत नौ दिवसीय राम कथा ग्रंथों की कृपा से, संतों की कृपा से, गुरु की कृपा से मां अहल्या के प्रसंग को केंद्र में रखते हुए सात्विक- तात्विक संवाद अंतरराष्ट्रीय संत रामकथा वाचक मोरारी बापू ने अष्टम दिवस की कथा का प्रारंभ किया।

उन्होंने कहा कि भगवन लीला का दर्शन, भगवन नाम का सुमिरन, भगवन के धाम में रहने का सद्भाग मिले। इन चारों का जिनको आनंद ना मिले और ये आनंद महसूस ना कर सकें। पृथ्वी का बोझ है। जब हम कथा में होते हैं तो साधु साधक तो नित्य कर्म निभाते ही हैं। लेकिन कहीं हम जैसे लोग कथा में जब होते हैं तो नित्य कर्म का निर्वहन न भी कर सके, तो कथा स्वयं परायण है।

लीला दर्शन, लीला श्रवण ये रामचरित मानस का परायण हैं। स्वाध्याय ये परायण है, ये प्राणायाम है। कथा हमें परमात्मा परायण, सत्य के, प्रेम के, करुणा के परायण बना देती है। कथा सूत्रों का संगम है।

गोस्वामी जी ने रामचरित मानस में पराग, रेणु, धुरी, रज ऐसे सगोत्री शब्दों का वर्णन किया है। इन सब शब्दों का प्रयोग अहल्या के प्रकरण में भी मिलता है।

जीवात्मा का पतन अथवा नाश बुद्धि नाश से होती है। मृत्यु से तो नए कपड़े पहने से प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन नाश तो हमारा बुद्धि जब नष्ट होती है, तब होती है। हमारा नाश बुद्धि नाश से होता है और बुद्धि भ्रष्टता से। हमारी बुद्धि को कोई दीक्षित करे। ऐसा कोई संत मिले। उसका भी शुद्धिकरण करें। बुद्धि परमात्मा को दे दो।

जगतगुरु श्रीमद वल्लभाचार्य के अनुसार,”यह जीव स्वभाव से दुष्ट है। कुछ भी देता है तो सूक्ष्म अहंकार बच ही जाता है।” उनके अनुसार स्वभाव दुष्ट है। ज्ञान से मुक्ति मिलेगी परमात्मा नहीं मिलेगा। परमात्मा तो केवल प्रेम से मिलेगा।
उन्होंने आगे कहा कि जिसके पास अर्थ-संपदा है। उसको पांच भागों में बांट देना चाहिए। पहला भाग धर्म के लिए, दूसरा भाग कीर्ति के लिए, तीसरा भाग अर्थ वृद्धि के लिए, चौथा भाग कामनाओं की पूर्ति के लिए और पाँचवा भाग स्वजन दीन-दु:खी के लिए प्रयोग करना चाहिए।

समय भी एक सबसे बड़ी संपदा है। समय का एक भाग भजन- साधना के लिए, दूसरा भाग यश के लिए, तीसरा भाग समय को सार्थक करने के लिए, चौथा भाग मौज मस्ती के लिए, पांचवा भाग अपने लोगों के लिए उपयोग करना चाहिए।
जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य भगवान के श्री भाष्य के अनुसार,” पूरा जगत परमात्मा का शरीर है। परमात्मा इसी शरीर में आत्मा है और आत्मा का स्वरूप आनंद है।”

रामायण हमें सिखाती है स्वजनाय च। अत्यंत प्रेम में अहल्या जी अधीर है। शरीर पुलकित है। मन, वचन, कर्म सबको कोई न कोई असर हुआ है। मुख न आव बचन कही।

अतिशय बड़भागी की चर्चा करते हुए बापू ने कहा कि,”चांचल्य के कारण अपने पास कुछ रूप है, कुछ कला है। और रूप, कला और कौशल्य के कारण जो थोड़ा रजोगुण मर्यादा से बाहर निकल गया। उसके कारण यह घटना घटी और वह सभी उन वृत्तियों को चट्टान की तरह को बटोर लिया। अतिशय बड़भागी का एक लक्षण माना जाएगा। गीता कहता है कि कछुआ जैसे अपने प्रत्येक अंग को एकदम अपने अंदर ले लेता है। अहल्या ने आज ठीक उसी तरह से समस्त वृत्तियों का एकत्रीकरण करके जड़वत हो गई। ये उसका अतिशय बड़भाग है।

दूसरा अतिशय बड़भाग अहल्या ने संकल्प किया कि मैं कभी ऐसे चांचल्य के वशीभूत न हो जाऊँ। इसलिए मैं चट्टान की तरह स्थिर हो जाऊं।

अगर हम पाप धोने के लिए गंगा में जाएं। यात्रा करें। पाप से मुक्त हो जाए ये हमारी श्रद्धा है। लेकिन जिन से गंगा निकली वो स्वयं चरण मुक्त करने के लिए आए यह अहल्या का बड़भाग है। आज अहल्या को कोई प्रायश्चित नहीं है। आत्म चिंतन किया कि न हिलूँगी, न डोलूंगी और न आंख उठाकर देखूंगी। अब छल, बल और कुल तीनों से मुक्त हो जाऊंगी। छल हुआ था वो गया। तप के बल से गौतम ने श्राप दिया वह भी गया। मुझे रूप कौशल की कला है वह भी गया। ये तीनों गया।

उन्होंने संवाद आगे को बढ़ाते हुए कहा कि अहल्या हमारे जीवन के लिए बहुत अद्भुत मार्गदर्शन है। युवाओं से अपील करते हुए कहा कि कभी भी अपने आप को कोसना मत। भूल नहीं करनी चाहिए। लेकिन हम इंसान हैं, बड़े बड़ों ने भूल की है। हम कबूल नहीं करते हैं।st join buxar

विनोबा भावे की चर्चा करते हुए बापू ने कहा कि वे एक बार जेल में प्रवचन करने के लिए गए। सभी परेशान थे कि विनोबा जी क्या बोलेंगे? उन्होंने कैदियों को संबोधित करते हुए पहले ही कहा कि तुम भी गुनाहगार हो और हम भी गुनाहगार हैं। फर्क बस इतना है कि तुम पकड़े गए हो और हम पकड़े नहीं गए हैं। इसलिए हम आजाद हैं। शेर सुनाते हुए उन्होंने कहा कि,” या तो कबूल कर मुझे मेरी कमजोरियों के साथ। या छोड़ दे मुझे मेरी तन्हाइयों के साथ।।”

एक बार राम कहने से पाप पुंज नष्ट हो जाता है। इससे सरल उपाय क्या है? अहल्या आत्म निवेदन करके धन्य हो गई। यह प्रकरण में ढांढस देता है बल देता है।

सभी मस्त है कौन किसको संभाले। जिसे देखिए सब लड़खड़ाने लगा है।।

भुसुंडि जी ने गरुड़ जी को राम कथा सुनाई। भुसुंडि रामायण के अनुसार उन्होंने अति संक्षेप में राम कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भगवान राम का प्राकट्य, छोटी छोटी बाल लीलाएं, विश्वामित्र जी का आगमन, अहल्या का प्रकरण, मिथिला में प्रवेश, जनक जी द्वारा स्वागत, सुंदर सदन में ठहराना,शाम को नगर दर्शन, पुष्प वाटिका प्रसंग, की चर्चा की।
गोस्वामी जी की कवितावली के अनुसार धनुष यज्ञ का विस्तारपूर्वक चर्चा, परशुराम आगमन, सीताराम विवाह प्रसंग को बताया। सिया के विदाई की बातें सुनकर सबकी आंखें डबडबा गई। और अष्टम दिवस की कथा को विश्राम दिया गया। ।। जय सियाराम।।

इसे भी पढ़े :—————–

BUXAR UPTO DATE NEWS APP

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button