आग लगी है तन मन में, जल रहा है विश्व, अब सारा।

आग लगी है तन मन में,
जल रहा है विश्व, अब सारा।
सिसक रही मानवता सारी,
कैसा नव वर्ष हमारा।

आग लगी है तन मन में, जल रहा है विश्व, अब सारा।

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ /अशोक मिश्रा :- 

आग लगी है तन मन में,
जल रहा है विश्व, अब सारा।
सिसक रही मानवता सारी,
कैसा नव वर्ष हमारा।
दया, धर्म सब भूल गए,
सूखी करुणा की धारा।
रे हत्भाग्य, पूछता हूँ मैं,
कैसा नव वर्ष हमारा।
दूर हो गये सारे रिश्ते,
टूट गयी सारी कडियां।
शेष नहीं जब भाव हृदय में,
कैसा नव वर्ष हमारा।
कही विलखती माँ की ममता,
कहीं बहनों का स्नेह।
कहीं पिता बेवश हो बैठे,
छुट चुका है गेह।
सूख चुकी जब, इन, आंखों से
अविरल प्रेम की धारा
फिर कैसा नव वर्ष हमारा।
लौटो अपने पथ परफिर से,
तुम्हें प्रकाश मिलेगा।
मानव मन मानवता का,
एक नया आभास मिलेगा।
अगर नहीं तु लौट सके तो,
व्यर्थ संदेश तुम्हारा।
कैसा नव वर्ष हमारा।
मैं अशोक हूँ शोक न मुझको,
अपने पथ पर, अटल खड़ा हूँ।
जो कल था, मैं आज वहीं हूँ,
ध्रुव सा आज भी वहीं पडा हूँ।
मैंने अपने पूर्वजों की थाती है संभारा।
फिर कैसा नव वर्ष हमारा।

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