कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के साथ शुभारंभ होती ददरी मेला

कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने से और दानपुण्य करने से मनुष्य के सारे पाप कट जाते है और उसके परिवार में सुख-समृद्धि की बृद्धि होती है ।

dr ramesh singh

कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के साथ शुभारंभ होती ददरी मेला

बक्सर अप टू डेट न्यूज़ /विकास राय :- उत्तर प्रदेश के सबसे पूर्वी भाग में विद्यमान बलिया प्राचीन काल से ही अपनी अनेक विशेषताओं के लिए प्रख्यात रहा है ।इसके उत्तर में सरयू और दक्षिण में गंगा इन दोनों नदियों के द्वारा आप्लावित तथा पवित्रित इस भूखंड में पंडितों (विद्वानों), सन्यासियों, तथा संतो का आविर्भाव होता रहा है ।यहा के मान्य संस्कृत पंडितों ने काशी में आकर पाण्डित्य के प्रकर्ष का प्रदर्शन कर विमल कीर्ति अर्जित की है ।वैदिक कालीन ऋषियों में विशेष रूप से भृगु तथा उनके पट्ट शिष्य दर्दर मुनि की तप:स्थली होने के कारण आज भी भृगु क्षेत्र के नाम से अभिहित किया जाता है ।

महर्षि भृगु के आश्रम में जाकर उनको जल चढ़ा कर अपने सभी कष्टों से मुक्ति मिलने की कामना करते है

बलिया में कार्तिक पूर्णिमा का अलग ही महत्व है, ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने से और दानपुण्य करने से मनुष्य के सारे पाप कट जाते है और उसके परिवार में सुख-समृद्धि की बृद्धि होती है । साथ ही महर्षि भृगु के आश्रम में जाकर उनको जल चढ़ा कर अपने सभी कष्टों से मुक्ति मिलने की कामना करते है । यह क्षेत्र विमुक्त क्षेत्र कहलाता है जिसमे कार्तिक मास में स्नान करना प्रयाग राज और काशी से भी महत्वपूर्व व पुण्यफल देने वाला कहलाता है।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में यहां के निवासियों के विद्रोही तेवर देखकर इसे बागी बलिया के नाम से भी जाना जाता है ।
कार्तिक मास में लगने वाला दर्दर मुनि की आख्या से मंडित होने वाला ददरी मेला व्यापारिक जगत में बलिया की अलग पहचान आज भी संजोये हुए है ।बलिया का ददरी मेला प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा से प्रारंभ होता है ।इस मेले की ऐतिहासिकता का अंदाज हम इस बात से लगाया जा सकता है कि चीनी यात्री फाह्यान ने इसका जिक्र अपनी पुस्तक में किया है ।

महर्षि भृगु के पट्ट शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर गंगा किनारे लगने वाला ऐतिहासिक”ददरी मेला”भारत का दूसरा बड़ा मवेशी मेला है


गुलाम भारत की बदहाली को लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक वेहद मार्मिक निबंध लिखा”भारतवर्षोंन्नति कैसे हो सकती है”।इस निबंध को उन्होंने पहली बार बलिया के ददरी मेले के मंच पर 1884 में पेश किया था ।महर्षि भृगु के पट्ट शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर गंगा किनारे लगने वाला ऐतिहासिक”ददरी मेला”भारत का दूसरा बड़ा मवेशी मेला है ।एक माह चलने वाला यह मेला वैसे तो दीपावली के बाद ही शुरू हो जाता है जिसमे देश के कोने कोने से अच्छी नस्लों के पशुओं की खरीद विक्री की जाती है ।परंतु इसकी औपचारिक शुरुआत कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के बाद हो जाती है ।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा व सरयू(घाघरा) के संगम में लगभग 5 लाख लोग आते है व स्नान करते है ।ऐसा माना जाता है कि यहां स्नान मात्र से ही काशी में 60 हजार वर्ष तक तपस्या करने के बराबर पुण्य मिलता है ।कहा जाता है कि विष्णु को लात मारने पर महर्षि भृगु को जो श्राप मिला था उससे मुक्ति इसी क्षेत्र में ही मिली थी ।तपस्या पूरी होने पर महर्षि भृगु के परम् शिष्य दर्दर मुनि के नेतृत्व में यज्ञ हुआ था जो एक माह तक चला जिसमे 88 हजार ऋषियों का समागम हुआ था ।यही नही यही पर भृगु मुनि ने ज्योतिष की विख्यात पुस्तक भृगु संहिता की भी रचना की थी । कहा जाता है कि इसी पुस्तक को संत समाज ने बलिया में एक माह के शास्त्रार्थ के बाद सर्वसम्मति से स्वीकार किया था।

गंगा- यमुना के संगम पर यज्ञ हुआ इसीलिये इस पूरे क्षेत्र को बलियाग

उसके बाद से शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ लोक मेला में तब्दील हो गयी ।इसकी पुष्टि हमे बलियाग शब्द से भी होती है जो बलिया का अपभ्रंश है,जिसके बारे में कहा जाता है कि गंगा- यमुना के संगम पर यज्ञ हुआ इसीलिये इस पूरे क्षेत्र को बलियाग अर्थात यज्ञ का क्षेत्र कहा गया ।बाद में बलियाग से “ग” अक्षर का लोप हो गया और यह क्षेत्र बलिया के नाम से विख्यात हुआ ।कार्तिक पूर्णिमा के दिन से लगने वाला ददरी मेला का मीना बाजार करीब डेढ़ किमी की परिधि में लगता है। विभिन्न प्रकार की करीब 500 से अधिक दुकानों को खुद में समेटे इस मेला का भारतेंदु मंच कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का गवाह बनता है । चेतक प्रतियोगिता व दंगल के साथ ही अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, मुशायरा, लोक गीत, कव्वाली आदि कार्यक्रम करीब एक महीने तक चलने वाले इस मेला की शान बढ़ाते है।

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