चरण कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर

कृपा पक्ष का आरंभ अहल्या जी के आश्रम से हुआ है। “चरण कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर ।” प्रीति पक्ष का आरंभ अयोध्या कांड में भरत मिलन से होता है और मानस के अंत में दीनता के पक्ष का आरंभ होता है।

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चरण कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर

बक्सर अप टू डेट न्यूज़/ए0एन0चंचल:- महर्षि विश्वामित्र की तपस्थली सिद्धाश्रम की पावन धरा पर नौ दिवसीय श्रीराम कथा के द्वितीय दिवस पर मानस अहल्या की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अंतरराष्ट्रीय संत रामकथा वाचक मोरारी बापू ने कहा कि,” आश्रम दर्पण सभ्यता का,अर्पण सभ्यता का और घर्षण सभ्यता का संगम है।”

बापू ने रामचरितमानस में 3 पक्ष बताये, पहला कृपा पक्ष दूसरा प्रीति पक्ष और तीसरा दीनता का पक्ष। कृपा पक्ष का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि इसका आरंभ अहल्या जी के आश्रम से हुआ है। “चरण कमल रज चाहती कृपा करहू रघुवीर।” प्रीति पक्ष का आरंभ अयोध्या कांड में भरत मिलन से होता है और मानस के अंत में दीनता के पक्ष का आरंभ होता है। “मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर। अस विचार रघुवंश मणि हरहु विषम भव भीर।।” उन्होंने इन तीनों पक्षों को पक्षपात मुक्त बताया।

उन्होंने आगे कहा कि राम जन्म से राम विवाह तक पांच यज्ञ रामचरितमानस में है। पहला पुत्रेष्ठि यज्ञ- जो की कामना प्रधान यज्ञ है। “श्रृंगी ऋषिही वशिष्ठ बुलावा। पुत्र काम शुभ यज्ञ करावा।।” दूसरा विश्वामित्र मुनि का सिद्धाश्रम का ” जहँ जप जग्य जोग मुनी करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।।”

तीसरा प्रतीक्षा यज्ञ जो कि अहिल्या जी ने युगों युगों तक किया।

इसे अहल्या का यज्ञ कह सकते हैं। जिस यज्ञ के नाम पर राम को विश्व प्रवासी कर दिया तुलसीदास ने, वो है धनुष यज्ञ। पांचवा और अंतिम यज्ञ परशुराम जी का यज्ञ का वर्णन करते हुए कहा कि, “कही जय जय जय रघुकुल केतु। भृगुपति गयउँ बनही तप हेतु।।” कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि इन पांचों यज्ञों के केंद्र में अहल्या हैं। इन पांचों यज्ञों को लेकर ही प्रेम यज्ञ चलता है।

ग्रंथि मुक्त ग्रंथ संत है और परमात्मा महा ग्रंथ है। उन्होंने राम नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि अहंकार सबसे बड़ा पाप है। अहंकार अति दुखद डमरुआ। बंधन और मुक्ति का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि अहंकार में जीना ही बंधन है। गुरु कृपा से अहंकार से मुक्ति ही मोक्ष है। जिसके कारण अहंकार का जन्म होता है हे ऋषि! वो अविद्या है और जिसके कारण से अहंकार से मुक्ति होती है वही विद्या है ऐसा उपनिषदों में वर्णन है।

रामचरितमानस सद्गगुरू है। जिसका कोई गुरु नहीं है वो मानस जी को अपना गुरु मान लें।

राम नाम की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि यह बीज महामंत्र है। महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥ अर्थात नाम की महिमा महादेव जानते हैं। आदि कवि वाल्मीकि मरा मरा कहके ब्रह्मर्षि हो गये।जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ शुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥ नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥ महामंत्र, बीज मंत्र, परम मंत्र, बीजों का बीज, परम का परम, तत्व का तत्व, प्राण का प्राण, आत्मा की आत्मा, परमात्मा का भी परमात्मा, राम। बोलो जय सिया राम।

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